06 जनवरी 2014

 आम  आदमी एक हथियार है। सत्ता के नए लोभियों के लिए। क्या केजरीवाल को पता है कि राजनीतिक जीवन कि शुरूआर में लालू यादव या मुलायम सिंह यादव जितने ईमानदार या क्रन्तिकारी थे उसके सामने उनकी नैतिक उड़ान कुछ भी नहीं। 

लेकिन  आज कहाँ है वो ?भ्रष्टाचार कि ऊंचाई पर। अब आपसे क्या उम्मीद करें केजरीवाल जी ?शुरू में तो सब ईमानदार होते हैं भई। 

17 मार्च 2012

भाई अखिलेश को ढेर सारी बधाइयाँ
                                                     आपकी विनम्रता और सादगी तो कमाल  की है. बनाया रखियेगा इसे ।हमारी दुआ आपके साथ है ।  
महान बल्लेबाज सचिन को कैसे  करें सलाम जबकि अपना देश उनकी धीमी बल्लेबाजी से हार गया.?

वाह रे महानता की परिभाषा ।अरे भाई आप देश के लिए खेल रहे हैं या अपने लिए?  अरे सचिन  भैया, अब तो जान बख्स दीजिये भारतीय टीम का .आप थे कभी जान भारतीय टीम के लेकिन अब बोझ बन गए हैं भैया ।आप खुद ही हट जायेंगे टीम से या धक्के मारकर बाहर किया जाए।

                                                                                           

29 मई 2011

सरकार नहीं तो कौन जिम्मेदार है ?

देश की जनता भयंकर मंहगाई से त्राहि -त्राहि कर रही है और सरकार में बैठे नेता कहते हैं  हम क्या करें ? कौन करेगा तब ?क्या भगवान अवतार लेंगे धरती पर ?देश की जनता सवाल पूछना चाहती है नेताओं से की वोट तो हमने तुम्हे दिया है या देश की तेल कंपनियों को ?एक अम्बानी है तो कई अरब के मकान अपनी पत्नी को उपहार में देता है ,अरबों का हवाई जहाज देता है अपनी बीबी को ,लाखों करोड़ रुपये जमा हैं देश के चंद लोगों के हाथ में|क्या वो नहीं दिखता सरकार को ? बस नेताओं को यही दिखता है की कई करोड़ सब्सिडी में जा रहा है ?
                                       क्यों डरती है सरकार ,चंद बड़े उद्योगपतियों से ?क्या उन्होंने ही अपना मत देकर उन्हें बैठाया है कुर्सी पर ?
                                                                                     नहीं सरकार को भी पता है की वो कितनी बेईमान और गद्दार  से देश की करोड़ों जनता के प्रति|
          मैं एक बार फिर चेतावनी देना चाहता हूँ मुठ्ठी भर बेईमान देश के उद्योगपतियों ,नेताओं और नौकरशाहों को की चेत जाओ नहीं अगर जनता का गुस्सा ज्वालामुखी बनके फट पडा फिर भगवान भी नहीं बचा सकता उनको |
   सावधान ?  

25 मई 2011

ये सरकार नहीं जल्लाद

कल पता चला ,देश की सरकार डीजल का दाम सोलह रुपये बढ़ने पर विचार कर रही है |
                      तर्क दिया जा रहा है कि डीजल पर दी जा रही सब्सिडी का लाभ कार रखनेवाले लोग उठा रहे हैं | वाह रे ढोंगी सरकार !अब महसूस हो रहा है कि देश कि सत्ता  कुछ ऐसे लोगों के हाथ में चली गई है जो देश की जनता को अपने फायदे के लिए तिल -तिल कर मरने के लिए भी मजबूर कर सकते हैं | क्या बेहूदा तर्क है -की आमिर लोग सब्सिडी का फायदा उठा रहे हैं इसलिए इसे बंद कर दिया जाए |  सिर्फ पंद्रह प्रतिशत अमीर ही ऐसे हैं जिनके पास डीजल की कारें हैं |इन पंद्रह प्रतिशत लोगों को रोकने के लिए सरकार पच्चासी प्रतिशत जनता को भयंकर मंहगाई के मूंह में धकेलने को तैयार है |
            इस देश के भ्रष्ट और बेईमान नौकरशाहों के पास न जाने कितने हजार करोड़ रुपये ऐयासी के लिए लिए रखे पड़े हैं वो नहीं दीखता इन सत्ताधारी भूखे भेडियों को,लेकिन एक सौ पच्चीस करोड़ रुपये जो डीजल पर सब्सिडी है ,जिसके कारण मंहगाई में भी  आम  भारतीय ज़िंदा रह सकता है ,लेकिन अब उसे ख़त्म करके इतनी मंहगाई बढ़ा देने की कोशिश हो रही है की आम आदमी एक जून खाना खाकर रहने के लिए विवश हो जाए |
            देश की सरकार में बैठे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए कि कहीं ऐसा न हो कि जनता बगावत कर बैठे और फ़्रांस कि राज्यक्रांति कि तरह यहाँ के भी सत्ताधारी वर्ग कि बगावत कि आग  जल कर भस्म होना पड़े |
                                           

01 फ़रवरी 2011

अमीर होता वर्ग ?सावधान रहो

|देश के धीरे -धीरे अमीर होते जा रहे वर्ग को मैं स्सवाधान करना चाहता हूँ की पैसे के बलपर चुनाव आयोग, देश की संसद और क़ानून बनने वालों तथा गरीब जनता को खरीदने की कोशिश न करें नहीं एक दिन सारा देश नक्सलवाद के हाथों की कठपुतली बन जाएगा |कोई उसूलों  पर चलनेवाला आदमी हथियार  उठाने पर मजबूर हो  जाएगा| जब देश के चंद लोग अपनी चालाकी और मक्कारी और ताकत के बल पर  सब कुछ अपने हिसाब से तय करने लगेंगे तो जो इमानदार लोग हैं , जो गरीब लोग हैं ,जो अनपढ़ लोग हैं वो क्या करेंगे |कभी सोचा है करोड़पति महोदय लोगों ने या नहीं ?नहीं सोचा तो अब सोच लीजिये |
                                  

बिहार चुनावों का सच |भाग -2

आज से बीस साल पहले जब विधानसभा चुनाव होते थे तो ,चुनाव में बाहुबली  और पैसे कमानेवाले लोग कहीं -कहीं चुनाव लड़ा करते थे |जनता के बीच रहनेवाला आदमी भी बड़े आराम से चुनाव लड लेता था .क्योंकि नामांकन  फीस सिर्फ ढाई सौ रुपये हुआ करती थी .लोग कहीं भी कार्यालय बना लिया करते थे |अनपढ़ और गरीब आदमी भी लोकतंत्र के इस महापर्व में भाग लेकर अपने  विचारों को जनता  के सामने रख सकता था |किसी आचार संहिता की कानूनी पेंच का झंझट नहीं था की आम आदमी आतंकित होकर चुनाव लड़ने की इच्छा का त्याग कर दे |
                                                                   लेकिन चुनाव आयुक्तों ने एक भारी भरकम बयान दिया की धनबल पर लगाने के लिए हम एक महान कदम उठा रहे हैं |कभी खर्च की सीमा का निर्धारण करने का नाटक हुआ तो कभी नामांकन फीस बढ़ा कर चुनाव से गरीबों को दूर करने की कोशिश हुई |क्या चुनाव आयोग के इस नाटक से चुनावों में धनबल का उपयोग कम हुआ ?क्या आज माफिया लोग ,,पैसे वाले लोग चुनाव नहीं लड रहे हैं?देश के चुनाव आयुक्तों से मैं ये सवाल करना चाहता हूँ इतनी गन्दी साजिश आपने रचाने के लिए कितने पैसे खाए देश के माफियाओं  से?
                                                                                                   वाह रे हमारा लोकतंत्र |सुधार का नाम देकर लोकतंत्र के महापर्व को चंद लोगों के हाथ की कठपुतली बना दिया |आज एक विधानसभा के चुनाव में एक करोड़ रुपया खर्च होता है |जनता को चुनाव से पहले दारु पिलाकर वोट माँगा जाता है |पहले जो प्रत्याशी पैसे से बैनर और झंडे तथा पोस्टर छपवा कर अपनी नीतियों के प्रचार में पैसे खर्च करते थे ,लेकिन आज वही  प्रत्याशी रात के अँधेरे में मतदाताओं के पास दारू और पैसे पहुंचवाता  है|
                क्या चुनाव आयोग ये रोक सकता है ?नहीं | चुनाव आयोग ये नहीं कर सकता क्योंकि इससे भ्रष्ट लोगों के चुनाव लड़ने में परेशानी हो जायेगी |   लेकिन यहाँ तो साजिश है की कैसे आम जनता को चुनाव लड़ने से रोका जाए !  और इसीलिए दिन बी दिन पूंजीवादी होते समाज में लोकतंत्र को सिर्फ चंद लोगों के हाथों में ही सीमित करने की साजिश होती जा रही है|
                                                            

25 जनवरी 2011

क्या है सच बिहार के चुनावों का

साथियों ,मैं बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में कैमूर जिले की रामगढ विधानसभा क्षेत्र  से एक दल का प्रत्याशी था| आप सोच रहे होंगे कि मैं आखिर कहना क्या चाहता हूँ ?
  मैं दरअसल कुछ ऐसे सच ,ऐसे अनुभव बताना चाहता हूँ जो पढ़े लिखे वर्ग के सामने नहीं आ पाते क्योंकि सारा मीडिया चारो तरफ एक ऐसा झूठ का माहौल खड़ा कर रहा है कि चुनाव आयोग द्वारा बनाये गए नियम लोकतंत्र कि किस तरह हत्या कर रहे हैं ये बात बुरी तरह से दबा दी गई है |
                                        साथियों, देश का बीस प्रतिशत कुलीन वर्ग ,नया हुआ अमीर वर्ग संसद में या चुनाव आयोग के अफसरों के रूप में आज से पंद्रह ,सोलह साल पहले चुनाव की व्यवस्था में  परिवर्तन लाने का क्रम शुरू हुआ |कभी कहा गया कि चुनाव में धनबल का प्रयोग कम करने के लिए ये सारे बदलाव किये जा रहे हैं | मैं इन बदलाओं की सच्चाई तब तक नहीं समझ पाया जब तक की चुनाव मैदान में नहीं उतरा |  नामांकन भरने गया तो पता चला की बिना वकील आप ऐसा कर ही नहीं सकते |वकील है तो फीस भी मांगेगा |यानी पैसे का खर्च |नामांकन फीस दस हजार रुपये |यानी गरीब आदमी का चुनाव लड़ना काफी मुश्किल |
 पैसे वाला आदमी यदि प्रत्याशी है तो वो एक नहीं पांच वकील रखता है ,उसके पास तनख्वाह पर रखे हुए लोग हैं जिनमें कुछ लोग जगह जगह सभाओं के लिए अनुमति लेने का काम करेंगे ,कुछ लोग कार्यालय खोलने के लिए भी अनुमति   लेने का काम करेंगे |और उम्मीदवार इन कामों से आजाद होकर प्रचार में डूबा रहेगा |अब आप सोचिये की जिसके पास ये सब न हो वो क्या क्या करे ?

21 जनवरी 2011

वाह रे भारत के सपूतों! गांधी की खटिया खड़ी कर दी

कल के हिंदुस्तान में पढ़ा कि एक सर्वे में पाया गया है कि लोकप्रियता में भारत के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से भी ज्यादा लोकप्रिय हैं |  भला हो देश के समाचार पत्रों का जिन्होंने इस खबर को कुछ इस अंदाज में पेश किया जैसे कितनी महान घटना है ये |मानो ख़ुशी से नाच उठा हो हिन्दुस्तान कि गांधी जैसे बेकार के आदमी को सचिन जैसे महान शख्स ने पछाड़ दिया हो |
                                                          भाई बात सही भी है क्योंकि समाज और देश के लिए सबकुछ कुर्बान करनेवाले लोगों कि जगह वैसे भी पागलखाने में ही है | सचिन तेंदुलकर जी का देश कि आजादी में क्या योगदान था मुझे नहीं मालूम ,शायद सर्वे करनेवाले को मालूम हो कि सचिन जी ने बल्ले के जोर से ही अंग्रेजी हुकूमत को मार भगाया हो? शायद सचिन  के बल्ले के जोर से देश कि हर भूखी नंगी जनता को भरपेट खाना नसीब होने लगा हो |वैसे देश के चंद अरबपति जानते हैं गांधी अगर याद आयेंगे तो इमानदारी याद आएगी| गांधी अगर याद आयेंगे तो देश के लिए कि हुई कुर्बानी याद आएगी |  इसीलिए नायक बनाओ एक ऐसे शख्स को जो मैदान जाकर बल्ला घुमाए और करोडो रुपये अपनी जेब में डालकर देश कि जनता में इतना लोकप्रिय हो जाए कि गांधी जैसा व्यक्ति  भी बौना दिखाई दे | वाह रे देश के सपूतों |

13 जून 2010

नीतीशजी ! असली सोना हैं तो डर कैसा

नीतीशजी ! असली सोना हैं तो डर कैसा?
                                                      एक फोटो  क्या निकला मोदी  जी के साथ ,नीतीश जी बौखला गए ||अरे भाई माना की आप धर्मनिरपेक्ष हैं ,बड़ी फ़िक्र है आपको देश के मुसलमानों की |लेकिन क्या हो गया अगर फोटो में आप उनके साथ दिख गए | लोकतांत्रिक भारत के एक राज्य के एक मुख्यमंत्री हैं वो |क्या ये गुजरात की जनता का अपमान नहीं है की उसके मुख्यमंत्री के साथ एक फोटो में दिखना तक मंजूर नहीं है आपको! बिहार में मुस्लिम भाइयों के लिए जो करना है आप ख़ुशी ख़ुशी करिए| क्या ये फोटो आपको कुछ करने से रोक रहा है ?
                                        कमाल hai   भाई |आपका ये राजनितिक ड्रामा हमारी समझ से बाहर है |शायद बिहार का चुनाव करीब है इसलिए मुस्लिम 
मतदाताओं की फ़िक्र में दुबले होते जा रहे हैं आप | चिंता मत करिए अगर आपकी नीयत साफ़ है तो मुस्लिम जरूर आपका साथ देगा |इसलिए बंद करिए इस तस्वीर पर चिल्लाना भाई और ध्यान दीजिये सिर्फ काम पर |ये काम ही समर्थन दिलाएगा आपको |न की धर्मनिरपेक्षता का ढोंग |

11 जून 2010

मतदाता का अंतर्विरोध

मतदाता का अंतर्विरोध !  
                                 बिहार के दौरे पर था |गोपालगंज  में कुछ लोगों ने पूछा की आपको क्या लगता है कि नीतीश जी दुबारा सत्ता में लौटेंगे ! बड़ा कठिन सवाल था | 
                कुछ  दिन पहले का नीतीश जी का भाषण याद आ गया |वे वाशिंगटन पोस्ट अखबार की एक खबर का हवाला दे रहे थे जिसमें कहा गया था कि विकास दर के मामले में बिहार भारत के अन्य राज्यों से आगे है | वे कहना ये चाह रहे थे कि उनके राज में बिहार काफी विकास कर रहा है | 
 उसी वक़्त एक दूसरी खबर भी कौंध गई दिमाग में कि बिहार के कोसी क्षेत्र के एक गाँव की दुर्दशा देखकर अमेरिका के बिल गेट्स इतने पिघले की उन्होंने गाँव को गोद ले लिया | क्या नीतीश जी बताएँगे कि जब आनेवाली बरसात एक बार फिर कहर ढायेगी तो कोसी के गाँव की कैसे रक्षा करेंगे वे ?
                                       क्या बिहार का बहुमत मतदाता अखबार पढ़ता है ? वाशिंगटन पोस्ट का नाम भी शायद नहीं सुना होगा बिहार के बहुसंख्यक मतदाताओं ने |  जिस मीडिया के माध्यम से नीतीश  जी नायक बनने का ख्वाब देख  रहे हैं वो शायद ही मददगार हों नीतीश जी के लिए आनेवाले विधानसभा चुनाव में |
                                                मैंने उन सज्जन को ये सारी बातें  बताई|
शायद  यही विडम्बना है इस देश की राजनीति की| 
                                                                   नीतीश  मध्यम वर्ग को बेवकूफ बना रहे हैं|  और भैया लालू जी पंद्रह साल बेवकूफ बनाकर बिहार पर ऐसा राज कर गए कि आज भी एक दू: स्वप्न की तरह याद आता है वो बिहार |
              न जाने  कब ख़त्म होगा बेवकूफ बनने का सिलसिला |  क्या है कोई रास्ता ? यदि है तो मुझे बताएं आप |
                                                            

31 मई 2010

क़ानून है या नाटक ?

क़ानून है या नाटक ?  
                               आज से बीस साल पहले की एक घटना मुझे आज न जाने क्यों याद आ रही है |दरअसल मैंने एक पत्रिका में देश में लागू  उस क़ानून के बारे में पढ़ रहाथा जिसमें चौदह साल से कम के बच्चो को काम पर रखना जुर्म माना गया  है | मेरे एक मित्र थे पटना में |मैं उस समय ग्यारहवीं में पढ़ता था |  मेरे मित्र के पिताजी अवकाश प्राप्त शिक्षक थे |उनके पास एक बहुत ही गरीब आदमी का बारह वर्षीय बेटा रहता था जो घर के लोगों को चाय -पानी पिलाया करता था |दरअसल वो लड़का सात भाई था |गरीबी का आलम ये की कमानेवाला सिर्फ एक उसका पिता और वो भी बीमार  व्यक्ति |
                             शिक्षक महोदय बड़े ही भावुक और इमानदार व्यक्ति थे एक दिन किसी तरह उस लडके के पिता से मिल गए |उसके पिता ने अपना दुख बताया तो उन्होंने उसे अपने घर रख लिया |
                                                                    उसे वे अपने बेटों की तरह मानते थे |कुछ ही दिनों में वो लड़का खा पीकर काफी स्वस्थ हो गया और कुछ घर में ही पढ़ने लिखने सीखने लगा  |उसकी जिंदगी मजे में गुजरने लगी थी ली अचानक एक दिन शक्षक महोदय के एक मित्र ने उन्हें श्रम क़ानून के बारे में बताया और साथ साथ ये भी कहा कि" आप गलत हैं क्योंकि  आप गैरकानूनी काम कर रहे हैं और यदि इसे आपने इसके घर नहीं भेजा तो आप कानूनी लफड़े में फँस जायेंगे |
                                                               उसके बाद आप सोच सकते हैं कि क्या हुआ होगा |उन्होंने उस लडके के पिता को बुलाया और  उसे अपनी मजबूरी बताते हुए उसे अपने  घर से हटा दिया |  बाद में वो लड़का फिर उसी गरीबी में पलने लगा और कुछ दिन बाद उसकी तबीयत खराब हो गई |
                                     कुछ दिन बाद वो लड़का इलाज के अभाव में मर गया |  मैं आज तक नहीं समझ पाता कि गलती क़ानून  बनानेवाली सरकार की थी या समाज की ?  क्या सार्थकता है इन कानूनों की देश में जहा आधी आबादी भूख को साथ लेकर सोती है |  

29 मई 2010

लाल क्रांति क्या है

लाल क्रांति क्या है?  
                               कहीं खून की होली खेलते लोग  तो कहीं सत्ता की नीतियों का शिकार बने दर्द और भूख से तड़पते लोग |अक्सर जब अखबारों में पढ़ता हूँ कि नक्सलियों ने फला जगह बम विस्फोट  किया तो फलाँ जगह ट्रेन उड़ा दिया |   और हम सब सर पकड़कर बैठ जाते हैं |  
                                     लेकिन चीजें इतनी आसान और सीधी सादी हैं जितनी दिखती हैं ?  क्या ये मामला सिर्फ क़ानून का है ? व्यवस्था का नहीं हैं ?  आम जन के साथ होनेवाले मजाक का नहीं है ?
                                           जहाँ अपनी जमीं का हिसा पाने के लिए न्यायलय में जज को घूस देना पड़ता है |जहाँ  बाप की अस्थि पाने के लिए बेटों को रिश्वत देनी पड़े | जहाँ कहीं कोई नियंत्रण  नहीं है शासन का देश के ताकतवर लोगों पर |जहाँ  लोकतंत्र एक मजाक और त्यौहार है मौज मस्ती का |  वहाँ कुछ लोग अपने असंतोष को दबा नहीं पाते और बंदूकें उठा लेते हैं    तो पूरा देश थर्रा उठता है|
                                             न्यूटन का सिद्धांत है कि क्रिया  के विपरीत प्रतिक्रिया होती है |  तो आप क्या सोचते हैं ? 
                                     ये नक्सलवाद क्या है ?  मैं आप पर छोड़ता हूँ फैसला !

23 मई 2010

प्रख्यात ब्लॉगर रविश जी का हिन्दुस्तान दैनिक में कालम पढ़ा .वे एक ऐसे ब्लॉगर कि चर्चा करते हैं जो बिहार के कोसी इलाके के एक म गाँव में अमेरिका के बिल गेट्स के दौरे की चर्चा करते हैं |सवाल एक बार फिर वही है की जिस बिहार की मिटटी से जन्मे हजारो लोग विदेशों में जाकर अरबो की संपत्ति के मालिक हैं उसी बिहार  के कोसी क्षेत्र की बदहाली की सुध जो ले रहा है वो न तो बिहारी है न हिन्दुस्तानी |
                                                                क्या करें हम ?शर्म करें या गुस्सा ?या आँख और कान बंद कर लें और आसपास क्या हो रहा है उस पर ध्यान देना बंद कर दें ?  लेकिन  अन्दर का जागरूक मानस ऐसा भी तो करने नहीं दे रहा है| 
क्यों हम अपनो के दर्द से आँखें चुराए बैठे हैं और पराये आकर हमारे अपनो के दर्द समेटने में लगे हैं |
                                   ये  बुद्ध और महावीर का देश है जहाँ त्याग और परोपकार की सबसे ज्यादा बातें हुई हैं |लेकिन क्यों उलटी शिक्षा लेते हैं हम |धन और स्त्री को पाप कहा गया है हमारे धर्मशास्त्रों  में |लेकिन हमारी  सोच का लगभग सारा हिस्सा धन और स्त्री को समर्पित है|
         धन्य हैं हम |   और धन्य है हमारा देश | 

17 मई 2010

मक्कारी शहर नहीं गाँव की औलाद है

मक्कारी शहर नहीं गाँव की औलाद है ?
 अरे भाई चौंकिए  मत| गाँव रहे हैं कभी ?जिनका गाँव की मिटटी से गहरा सम्बन्ध नहीं है वही कह सकता है की गाँव के लोग भोले -भाले और सीधे होते हैं |एक बार विजय दान देथा जी ने कहा था की गाँव का सबसे सीधा आदमी और शहर का सबसे बड़ा गुंडा एक बराबर हैं |
                                                                             मैं जिस भी गाँव में गया चाहे मेरा गाँव हो या कोई रिश्तेदारी का गाँव हर जगह एक दुसरे के प्रति लोगों में इतना द्वेष भरा पड़ा है की अगर आप चाहें कि किसी से मतलब नहीं रखते हुए चुपचाप अपना विकास करते रहें तो आप भूल जाइये ,ऐसा नहीं कर सकते आप |क्योंकि गाँव का आपका पडोसी अपना काम छोड़कर आप के पीछे पड़ा रहेगा कि कैसे आपको विकास के रस्ते  से पीछे खींचें |शहर में या बड़े महानगरों में भले ही लोगों के पास आपके लिए समय नहीं है लेकिन लोग जब भी मौक़ा मिलता है आपको मदद ही करते हैं |
                               भैया gaon   खाली दूर से  अच्छा लगता लगता है |
 एक कथा सुनाता हूँ |एक बार तुलसीदास जी जब मृत्यु शैया पर थीं उनकी पत्नी रत्नावली तो गाँव गए अपने पत्नी को अंतिम दर्शन देने |  तो गाँव के एक आदमी ने कहाः कि ",अरे यार ई तो तुलसिया है "
                                                                       तुलसी बाबा जी ने कहा ":तुलसी वहाँ न जाइये जहां आपका गाँव ;दास गया, तुलसी गया पड़ा तुलसी  तुलसिया नाम ;"  तो भैया यही है गाँव | 

15 मई 2010

सार्वभौमिक सत्य कुछ नहीं होता

सार्वभौमिक सत्य कुछ नहीं होता ?  सबके अपने अपने सत्य हैं ?अमेरिका में रहनेवाले व्यक्ति के लिए जब सूरज का डूबना सत्य होता है तो हमारे लिए उसी समय सूरज का निकलना सत्य होता है
               बात ईश्वर नाम के किसी अस्तित्व  के होने न होने की है,
   किसी भी इंसान के जीवन की घटनाएँ ही उसे आस्तिक या नास्तिक बनाती हैं |मैं बहुत बड़ा नास्तिक था |शायद कभी -कभी आज भी हो उठता हूँ |
                                  आज से बीस साल पहले की घटना है |मैं उस समय स्नातक का छात्र था दिल्ली विश्वविद्यालय में |छुट्टियों में अपने घर बिहार आया हुआ था |गाँव के एक लडके की शादी में मैं सासाराम गया हुआ था |शादी ख़त्म होने  के बाद मैं और मेरा एक मित्र ट्रेन के द्वारा बनारस शहर के लिए चल पड़े |हर स्टेशन पर सिर्फ एक मिनट रुकनेवाली सवारी गाड़ी में हम लोग चढ़े |दपहर का समय था और ट्रेन में तिल रखने की भी जगह नहीं थी |किसी तरह घुसते हुए मैं खिड़की के पास की एक सीट पर जा बैठा |गाड़ी आगे बढ़ी |मुहे प्यास लगी |पहले मैं सोचा की अगले स्टेशन पर गाडी रुकेगी तो पानी पी लूंगा
लेकिन अगला स्टेशन आयी और गाड़ी से उतरना भी संभव नहीं लगा और स्टेशन पर दूर दूर तक पानी की कोई संभावना नहीं दिखी |इधर मेरी प्यास जोरो पर थी |एक दो स्टेशन पार करते करते मेरी हालत खराब होने लगी |मैं आँखें बंद कर ली और मन ही मन गहराई से सोचा की काश मुझे एक गिलास पानी मिल जाए |

                            गाडी एक स्टेशन पर रुकी |अचानक खिड़की के पास एक छोटा बछा कहीं से एक बाल्टी में पानी और एक गिलास लेकर आया और मुझसे पूछने लगा ,भैया जी पानी पियेंगे क्या ?मेरी जान में जान आई |मैंने पूछा हाँ कितने का एक गिलास पानी दोगे ? उसने कहा कि एक भी पैसा नहीं |
                                                             उसने मुझे पानी पिलाया और चुपचाप वापस चला गया |मैं आज तक समझ नहीं पाता कि वो घटना क्या थी ? सिर्फ एक संयोग या टेलोपैथी या ईश्वर ?
                                           इसीलिए मैं अब इस बहस में नहीं पड़ता कि ईश्वर है या नहीं |  मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा कि तुम मानते हो कि ईश्वर है या नहीं |  मैंने उत्तर दिया कि मेरे मानने या नहीं मानने से क्या ईश्वर का अस्तित्व है |ईश्वर है तो है ,नहीं है तो नहीं है |ईश्वर स्वंय में एक अस्तित्व है |अस्तित्व ही तो ईश्वर है |फिर ईश्वर है या नहीं हैं ये बहस ही बेकार है |

14 मई 2010

राजनीति से दूर रहनेवालों !सावधान ?

राजनीति से दूर रहनेवालों !सावधान ?
                                                         इस देश का दुश्मन कौन ?राजनीति करनेवाले या राजनीति से दूर रहनेवाले ?जी नहीं राजनीति से दूर रहनेवाला इमानदार आदमी इस देश का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहा  है |
                             एक उदहारण दे रहा हूँ |मान लीजिये आप सड़क पर जा रहे हों और कुछ गुंडे  किसी महिला की इज्जत लूटने की कोशिश कर रहे हों तो आप क्या करेंगे ?उन गुंडों पर जो हथियार आपके पास हों उनसे हमला कर देंगे या अहिंसा के पुजारी बनकर चुपचाप वहाँ से खिसक लेंगे ?
                                        अब यही सवाल देश के लोकतंत्र के बारे में है |लोकतंत्र का सबसे बड़ा हिस्सा है चुनाव |ज्यादातर लोगों को मैंने कहते सूना है की राजनीति और चुनाव लड़ना ये दोनों शरीफों का काम नहीं है ,कि आजकल माफिया और अपराधी ही चुनाव लड सकते है |ये देश के बहुमत की आवाज है |ये आवाज उन लोगों की भी है जो अपना मत बूथों पर जाकर देते हैं |
                                                                 ये तथाकथित देश के शरीफ लोग राजनीति का मैदान गलत लोगों के लिए छोड़कर देश का कौन सा भला कर रहे हैं |राजनीति और लोकतंत्र का बलात्कार करनेवालों से भिड़ जाना न्याय है या वहाँ से हट जाना ?
                                                                                 लेकिन इस देश में ऐसे लोगों को ही पूजा जाता है जो अपने आप को  महान कहलाने के लिए जिम्मेदारियों से पलायन कर जाते हैं |
                                                          दुनिया के तमाम देशों में ,रूस ,अमेरिका चीन आदि  में राष्ट्रीय आंदोलनों के पश्चात उन आंदोलनों का नेतृत्व करनेवाले ही देश की बागडोर अपने हाथों में लेते हैं |चाहे वो रूस के लेनिन हों या दक्षिण अफ्रिका के नेल्सन मंडेला या अमेरिका के जार्ज  वाशिंगटन|
                                                            लेकिन हमारे देश में जब देश आजाद हुआ तो गाँधी जी देश की राजधानी से दूर नोआखाली में शोक मना रहे थे देश के विभाजन का |
                                                        आज से पैंतीस साल पहले जब देश में लोकतंत्र  कैद कर दिया गया और इमरजेंसी लगा दी गई तो आन्दोलन की बागडोर थी जयप्रकाश नारायण के हाथों में और बाद में जब सरकार बनी जनता पार्टी की तो देश के प्रमुख बने मोरारजी  देसाई |
                         आखिर क्या परेशानी इस देश  के महान लोगों की?शायद उनके लिए अपने देश से ज्यादा कीमत थी अपनी छवि की |
              शायद इसीलिए हमारे देश में लोग राष्ट्र की कीमत नहीं समझते | तब क्यों हम चिल्लाते हैं की राजनीति में देश की परवाह नहीं करनेवाले लोग भरे पड़े हैं |
                                                   जब महानता के शिखर पर बैठे हुए लोग भी देश से ज्यादा अपनी परवाह करते दिखते हैं तो आम जन उनसे प्रेरणा लेकर राजनीती को अपनी दौलत  और ताकत के रूप में इस्तेमाल करता है तो इतनी हाय तौबा क्यों ?
                                                                        हमें शायद नए सिरे से इस देश के महान लोगों का इतिहास लिखना चाहिए और काल के कब्र में जाकर भी अनश्वर हो उठे महापुरुषों की इस बड़ी भूलों को आनेवाली पीढ़ियों के सामने रखा जाना चाहिए |
                                                               और सोचना चाहिए की राजनीति से दूर जाकर हम ठीक कर रहे हैं या गलत |

12 मई 2010

अपराधी कौन ?

अपराधी कौन ? ,
                            ब्रिटेन की संसद में ,कई साल पहले भाषण देते हुए एक सांसद ने कहा की समाज में  हम जिस अपराध को जानते हैं वो सिर्फ पुरे अपराध जगत का दस फीसदी हिस्सा है बाकी नब्बे प्रतिशत अपराध पर हम चर्चा ही नहीं करते |
                                                                             विख्यात समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने एक बार कहा था कि मेरा बस चले तो मैं बच्चों की एक पार्टी बनाऊं जिसका काम सिर्फ ये हो की जब बच्चों की माँ उन्हें थप्पड़ मारें तो वे पलटकर अपनी माँ को एक तमाचा लगा दें इससे ऊपर से निचे तक जो अन्याय की कड़ी फैली हुई है वो टूट जायेगी | दरअसल लोहिया जी उस चीज के बारे में बात करना चाहते हैं जो देश के सरकारी कार्यालय या हर सार्वजनिक कार्य वाले जगहों पर जो शीर्ष अधिकारी होते हैं वो अपने नीचेवाले को डांटते हैं तो वो नीचेवाला अपने वरिष्ठ से डरा हुआ है इसलिए गर्दन नीचे करके सह लेता है और अपना गुस्सा अपने नीचेवाले पर निकालता है |अब ये क्रम चलते चलते सबसे नीचेवाले कर्मचारी तक पहुंचता है तो वो नीचेवाला अपने घर आता है |और सारा गुस्सा अपनी औरत पर निकालता है | अब औरत क्या करती है ? औरत भी चूकि अपने पति की ताकत के आगे विवश और लाचार है तो वो पति का सारा गुस्सा  अपने बच्चों पर निकालती है उन्हें मारती पिटती है |तो लोहिया जी कहते हैं की अगर बच्चा अपनी माँ के थप्पड़ का जवाब पलट कर दे दे तो औरत भी पलटेगी और अपने पति के थप्पड़ का जवाब देगी फिर पति अपने कार्यालय में अपने वरिष्ठ को जवाब देगा और  इस तरह ये अन्याय बंद होगा 
                               क्योंकि जब बच्चा अपनी माँ के गुस्से का जवाब नहीं दे पाता तो वो सडकों पर अपने गुस्से का इजहार करता है और अपराधी बन जाता है
                                            तो ये अन्याय बंद हो इसके बारे में हमें विचार करना पडेगा || 

11 मई 2010

क्या संभव नहीं है कुछ भी बदलना ?

क्या संभव नहीं है कुछ भी बदलना ? शायद नहीं | क्योंकि राम और कृष्ण ,वेदव्यास और बाल्मीकि ,aryabhatt और वराहमिहिर ,कालिदास और चाणक्य के इस देश में जितना लिखा पढ़ा गया उतना दुनिया  में शायद  कहीं नहीं लिखा गया| क्या और कितनी नैतिक शिक्षा या नैतिक बदलाव हम ला पाए समाज में ?
                           कभी आपने सूना है हमारे देश में किसी बड़े पैसेवाले को कि उसने अपनी जीवन भर कि कमी को दान कर दिया हो समाज कि सेवा के लिए ?एक बिल गेट्स अपनी बुद्धि से दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनता है और एक दिन आता है जब अपना सब कुछ दान करके वो हट जाता है |
                                                      क्या कोई ऐसा उदहारण हमारे हिन्दुस्तान में आपको खोजे मिलेगा ?
                        एक बिल क्लिंटन पर आरोप लगता है कि वो मोनिका लेविंस्की नाम की महिला के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना चुका है | थोड़े से ही किचकिच के बाद वो राष्ट्रपति पुरे राष्ट्र के सामने स्वीकार करता है की हाँ मेरे सम्बन्ध रहे हैं |
                                            ज़रा सोचिये अपने राष्ट्र के  किसी बड़े नेता के बारे में |चाहे सबकुछ दुनिया के सामने आ जाए लेकिन वो मरते दम तक अपने सच को स्वीकार नहीं करेगा और कई सालों तक देश की अदालत को अपने मामले में उलझाए रखेगा |
                                           सोचिये |ये वही देश है जहां सबसे ज्यादा धर्म और नैतिकता की किताबें लिखी गई हैं | कितना सीखा है लोगों ने 
   अरे जनाब लिखने और मीडिया के माध्यम से या अखबारों के माध्यम किसी समाज को आप नहीं बदल सकते |उन्हें पढ़नेवाले लोग सिर्फ मनोरंजन के रूप में ही लेते हैं किसी नैतिक शिक्षा को बस | 

ये सत्य तो बड़ा कड़वा है भाई

मैं एक ऐसे देश का नागरिक हूँ जहां न्याय के मंदिर को सबसे ज्यादा पवित्र और उम्मीद का आखिरी दरबार समझा जाता है |
                       ये वो सत्य है  जो हमें दिखाया या पढ़ाया जाता है |
 अब सुनिए वो घटना जो ऊपर कहे गए सत्य को कठगरे में खडा करता है |बनारस के पास एक गाँव है |जहां जमीं को लेकर दो पक्षों में झगड़ा हुआ |एक पक्ष ने दुसरे पक्ष की एक बूढी महिला  का हाथ मारकर तोड़ दिया| महिला ने स्थानीय थाना प्रमुख से न्याय नहीं मिलने के कारण जिले की अदालत में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के सामने न्याय के अर्जी दाखिल की | अदालत में बहस हुई और दंडाधिकारी ने आदेश सुरक्षित रख लिया |दो दिन बाद दंडाधिकारी ने अपने पेशकार के  माध्यम से महिला के पास खबर भिजवाई की दो दिन बाद तारीख है मैं उस दिन सम्मान जारी कर दूंगा लेकिन कुछ खर्चा पानी चाहिए |महिला मेरे जान पहचान की थी |उसने मुझसे सारी बात बताई |मैं हैरान होता हुआ वकील से मिला |वकील ने बताया की ये तो जरूरी है |हर केस में ऐसा होता है |बिना दंडाधिकारी को पैसा दिए किसी केस में आदेश नहीं होता है |मैं अब तक हैरान -परेशान हूँ |समझ नहीं पाता की इस बात को किसके आगे कहूँ|
                    अक्सर समाचार पत्रों में पढ़ता हूँ कि फलां ताकतवर आदमी को क़ानून ने नहीं बख्शा ,तो फलाँ को सजा हो गई ,वगैरह वगैरह |
                 लेकिन ये घटना क्या है आखिर |जहां सच सिर्फ ये है कि दंडाधिकारी बिना खर्चा पानी लिए सही आदेश भी नहीं कर सकता |
            हम कौन से अंधा युग में जी रहे हैं |युग अंधा है या हम |या अंधा है क़ानून |
                                   आइये हम सब सोचें |क्योंकि कभी न कभी हम सबका पाला अदालतों से पड़ने ही वाला  है